नथुनी चाचा के पेड़ों में , पुआल के उन ढेरों में ,
हँसता लिपटा सा खेतों में, मदमस्त रहे जो थपेड़ों में,
इस्कूल को होती देरी में , घंटी बजते ही छुट्टी में ,
रस्ते में पड़ती बेरी में , पतली खेतों की मेंड़ी में ,
लाला की बारी के भूतों में , कुछ फट से गए जूतों में,
झोलों से लटकती किताबों में, हर रात बदलते ख्वाबों में ,
हँसता रोता सा बचपन देखा है ... हाँ, मैंने भारत को देखा है ||
डांटती चिढ़ाती दीदी में , छत पर जाती उस सीढ़ी में,
भैया की “करतूतों में”,नित नए पुराने झूठों में,
काका से चुराई बीड़ी में, नेवाजू बाबा की फकीरी में,
मैया ने ओढाई उस चादर में , बाबूजी के मनीआडर में,
माता के जगरातों में , बूढ़ी दादी की बातों में ,
खेतों में खोती गेंदों में , हार जीत की तकरार लिए,
ट्रेक्टर की टाली से लटके हुए .. खिलता वो लड़कपन देखा है ...
हाँ, मैंने भारत को देखा है ||
घर से आई उस चिठ्ठी में , बाटी चोखे और लिट्टी में,
सोंधी कुल्हड़ की खुशबु में , माँ है जो ऐसी मिटटी में ,
मैया की आँखों के सपनों में , कुछ खोये हुए से अपनों में ,
गुड़ की ताज़ी भेली में , बच्चों की अठखेली में ,
रुक रुक चलती उन ट्रेनों में , गाँव की यादें समेटे हुए ,
सालाना घर पर आने में , बक्से से बांटे खजाने में ,
भरसाईं में भूंजे दानों में , सर्दी में रजाई में दुबके हुए ..
हाँ, मैंने भारत को देखा है ||
बच्चों की निश्छल हंसी में , माँ की आँखों की नमी में ,
भिक्षुक की आँखों की आस में , थके पथिकों की प्यास में ,
अशफाक की मज़ार में , बिस्मिल की टूटी दीवार में ,
गंगा मैया की लहरों में , जागे उन्नीदें शहरों में
वन को जाते हुए रामों में , कुम्भों में रमजानों में,
शब्दों में सिमटे जज्बातों में , कुछ बिगड़े से हालातों में ,
रोजन चाचा की सेवैयाँ खाते हुए .. संक्रांति में पतंगे उड़ाते हुए ..
हाँ, मैंने भारत को देखा है ||
अब तक यह भारत ही था , जिस से हमको था प्यार मिला ,
टुकड़ों में इसको बांटो ना .... हमने टुकड़ों को मरते देखा है .....